पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई से पहले गुजारा भत्ता की संपूर्ण बकाया राशि खाते में जमा कराना जरूरी नहीं : दिल्ली हाईकोर्ट [निर्णय पढ़ें]

पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई से पहले गुजारा भत्ता की संपूर्ण बकाया राशि खाते में जमा कराना जरूरी नहीं : दिल्ली हाईकोर्ट [निर्णय पढ़ें]

दिल्ली हाईकोर्ट ने सबीना सहदेव बनाम विदुर सहदेव मामले में कहा है कि निचली अदालत के आदेश के अनुरूप गुजारा भत्ता की संपूर्ण राशि पुनरीक्षण याचिका पर गौर करने से पहले खाते में जमा कराना जरूरी नहीं है।

विरोधाभासी विचार

इस मामले में दो एकल पीठों द्वारा सुनाए गए परस्पर विरोधाभासी फैसलों को देखते हुए इस मामले को खंडपीठ को सौंप दिया गया।

राजीव प्रींजा बनाम सारिका एवं अन्य मामले में  हाईकोर्ट की एकल पीठ ने एक आम आदेश देते हुए सभी सत्र अदालतों से कहा कि सीआरपीसी की धारा 399 के तहत आपराधिक पुनर्विचार याचिका पर सीआरपीसी की धारा 125 के तहत अंतरिम गुजारा भत्ता देने के फैसले पर विचार करने के दौरान बिना किसी अपवाद के वे पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई शुरू होने के पहले सारा बकाया जमा कराने पर जोर देंगे।

एक अन्य एकल पीठ ने ब्रिजेश कुमार गुप्ता बनाम शिखा गुप्ता और अन्य मामले में कहा कि पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई से पहले इस तरह की पूरी बकाया राशि को जमा कराने की कोई बाध्यता नहीं है। यह भी कहा गया कि डीवी अधिनियम की धारा 29 के तहत अपील को इस तरह की स्थिति में रोका नहीं जा सकता।

मुद्दा क्या है

न्यायमूर्ति विपिन सांघी और न्यायमूर्ति पीएस तेजी की खंडपीठ के समक्ष मुद्दा यह था कि राजीव प्रींजा मामले पर गौर करते हुए कहा कि क्या एकल पीठ सीआरपीसी की धारा 399 और 401 के तहत बच्चे और पत्नी को गुजारा भत्ता देने के आदेश के खिलाफ किसी आपराधिक पुनरीक्षण पर रोक लगाने संबंधी आम निर्देश सीआरपीसी की धारा 125 के तहत दे सकता है या नहीं।

‘आम निर्देश” वैधानिक उपचार को सीमित करता है

“एकल जज के इस निर्णय के बारे में हमारी राय नकारात्मक है। क़ानून की नीति क्या होनी चाहिए यह तय करना विधायिका का काम है और कोर्ट इस मामले में कोई निर्देश नहीं दे सकता। किसी मौजूदा क़ानून की व्याख्या एक बात है और ऐसा करते हुए इस तरह की व्याख्या करें जो उद्देश्यपरक हो, जैसे वैसी व्याख्या जो क़ानून बनाने के उद्देश्यों को आगे बढाता है। हालांकि, कोई वैधानिक युक्ति तैयार करना जो कि विधायिका भी नहीं दे पाया तो इस तरह का निर्देश एकल जज को नहीं देना चाहिए था क्योंकि यह पुनरीक्षण के उपलब्ध उपचार को सीमित करता है,” पीठ ने कहा।

अपीली को कार्यपालक अदालत में नहीं बदला जा सकता

पीठ ने कहा कि यह भ्रम है कि पुनरीक्षण जैसे वैधानिक उपचार किसी आदेश या फैसले को स्थगित करने जिसा ही है।  “किसी आदेश पर पाबंदी लगाने संबंधी इस तरह के किसी आवेदन पर गौर करने के दौरान, अपीली अदालत मामले के गुण-दोष की जांच करने के साथ साथ प्रथम दृष्टया ऐसे फैसलों पर भी गौर करना चाहिए जो उसके लिए बाध्यकारी है। इसमें सालू ओझा मामले में दिया गया फैसला भी शामिल है, हालांकि, पुनर्विचार के वैधानिक उपचार और तत्संबंधी अधिकार बको गुजारा भत्ता को जमा कराने संबंधी पूर्व शर्त से नहीं बांधा जा सकता...,” कोर्ट ने कहा।

कोर्ट ने एक अन्य एकल पीठ द्वारा ब्रिजेश कुमार गुप्ता मामले में दिए गए फैसले से इत्तिफाक जताते हुए कहा, “डीवी अधिनियम के तहत सीआरपीसी की धारा 125 और 29 के तहत गुजारा भत्ता देने का आदेश इतना कठोर और अतार्किक हो सकता है कि दूसरे पक्ष/पति के लिए इसे मानना असंभव हो सकता है। अनुभव यह बताता है कि बहुत मामलों में अंतरिम गुजारा भत्ता जो कि मजिस्ट्रेट के पास आवेदन देने की तिथि से ही जमा करा दिया जाना चाहिए था, वह बढ़कर एक भारी राशि हो जाती है जो लाखों रूपए तक चला जाता है। हर मामले में अंतरिम राहत की राशि कम ही हो यह जरूरी नहीं होता। उसके वैधानिक उपचार के अवसरों को सिर्फ इसलिए सीमित करना क्योंकि वह अंतरिम गुजारा भत्ते की बकाये की सारी राशि जमा नहीं कर सकता,न्यायपूर्ण और तार्किक नहीं है।”