महिला और बच्चों का वाणिज्यिक यौन शोषण : कलकत्ता हाईकोर्ट ने जांच और अभियोजन के लिए दिशानिर्देश जारी किया [आर्डर पढ़े]

कलकत्ता हाईकोर्ट ने अनैतिक देह व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 के तहत मामलों की जांच और सुनवाई के लिए दिशानिर्देश जारी किए हैं। कोर्ट ने कहा है कि इन निर्देशों को मानक मानकर इनका पालन करने की जरूरत है।

न्यायमूर्ति रवि किशन कपूर और न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची ने राज्य की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए ये दिशानिर्देश जारी किये। इस याचिका में संगीता साहू नामक महिला  को दी गई जमानत को रद्द करने की मांग की गई थी। संगीता पर एक होटल में संगठित रूप से देह व्यापार चलाने का आरोप है। उसके खराब स्वास्थ्य को देखते हुए उसे अग्रिम जमानत दी गई थी और उसने यह भी कहा था कि उसे यह नहीं पता था कि उसके होटल से देह व्यापार होता है।

कोर्ट ने हालांकि मामले की गंभीरता और आरोपी के खिलाफ लगे गंभीर आरोपों को देखते हुए अग्रिम जमानत दिए जाने के निचली अदालत के लापरवाही भरे तरीके की आलोचना की। कोर्ट ने कहा, “जितनी जल्दबाजी में संक्षिप्त सुनवाई के बाद अग्रिम जमानत दी गई उसको देखकर हम आहत हैं जबकि आरोप एक संगठित अपराध रैकेट से कम उम्र की लड़कियों के वाणिज्यिक यौन शोषण का था। आरोपी उस परिसर की मालकिन है जहां इस तरह की अनैतिक गतिविधियाँ चल रही थीं।”

कोर्ट ने कहा कि अनेक पीड़िता ने यह बताया था कि कैसे सुश्री साहू ने उनका यौन शोषण किया पर गवाहियों का बयान रिकॉर्ड करने में हुई देरी पर अफ़सोस जाहिर किया। पीठ ने इस बात पर भी अफ़सोस जाहिर किया कि पीड़ितों के बयान मजिस्ट्रेट के समक्ष नहीं रिकॉर्ड किये गए। कोर्ट ने इस तरह के अपराधों की शिकार लड़कियों और महिलाओं को मदद और उनके पुनर्वास की जरूरत बताई।

इसके बाद कोर्ट ने सुश्री साहू की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी और निम्नलिखित दिशानिर्देश जारी किए :

“(a) आईटी(पी) अधिनियम या आईपीसी की धारा 370/372/373 या वाणिज्यिक यौन शोषण के लिए पोक्सो (पीओसीएसओ) अधिनिमम के तहत दर्ज किसी भी एफआईआर की जांच कोई विशेष एजेंसी जैसे मानव तस्करी निरोधक इकाई करेगी;

 (b) स्थानीय थाने में दर्ज इस तरह के मामले को 24 घंटे के भीतर विशेष एजेंसी को जांच के लिए भेजी जाएगी;

 (c) राज्य सरकार इन मामलों की जांच के लिए हर जिले में मानव तस्करी विरोधी इकाई गठित करेगा और इसमें प्रशिक्षित पुलिस वाले तैनात होंगे जिनका रैंक इंस्पेक्टर से कम नहीं होगा और इसमें महिलाओं की नियुक्ति को वरीयता दी जाएगी।

 (d) छापे के दौरान पीड़ितों के बयान के बाद उनका बयान आवश्यक रूप से सीआरपीसी की धारा 164 के अधीन दर्ज की जानी चाहिए;

 (e) पीड़ितों को चिकित्सा सुविधा दी जानी चाहिए जिसमें मनोवैज्ञानिक सलाह भी शामिल है;

 (f) पीड़ितों के बयान की रिकॉर्डिंग के बाद उन्हें अंतरिम राहत के तौर पर वित्तीय मदद और पश्चिम बंगाल राज्य द्वारा पीड़ितों को मुआवजा दिलाने की योजना के तहत अन्य तरह के पुनर्वास की व्यवस्था की जाएगी। अगर पीड़ित नाबालिग है, तो उसे बाल कल्याण समिति के संरक्षण में दे देना चाहिए ताकि उसका ख़याल रखा जा सके और उचित पुनर्वास हो सके;

(g) विशेष अदालत/क्षेत्रीय मजिस्ट्रेट जिनके पास मामला लाया जाता है, जांच एजेंसी और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव से पीड़ितों को पहुंचाई गई विभिन्न तरह की मदद के बारे में रिपोर्ट तलब करेंगे;

(h) जब भी किसी पीड़ित या उसके परिवार को कोई खतरा हो तो उसको और उसके परिवार वालों को निचली अदालत उचित पुलिस सुरक्षा दिलाने का निर्देश देगा;

(i) इस तरह के मामले में अभियोजन बहुत ही शीघ्रता बरती जाएगी और मामले को जल्दी निपटाया जाएगा।

(j) सुनवाई के दौरान, सरकारी अभियोजक गवाहों के बयान बिना किसी विलंब के रिकॉर्ड करेगा और संभव हो तो सुनवाई शुरू होने के एक महीने के भीतर करेगा ताकि पीड़ित को अपने पक्ष में करने या उसको डराने धमकाने की न्यूनतम आशंका हो।

 

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