सुप्रीम कोर्ट में पांच जजों की संविधान पीठ का फैसला : संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट पर भरोसा कर सकती है अदालत [निर्णय पढ़ें]

बुधवार को पांच जजों की संविधान पीठ ने कहा कि न्यायालय संसदीय स्थायी समिति रिपोर्ट पर भरोसा कर सकती है। संविधान बेंच में मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस एके सीकरी, जस्टिस एएम  खानविलकर, जस्टिस डीवाई चन्द्रचूड और जस्टिस अशोक भूषण ने सर्वसम्मति से फैसला दिया कि अदालत की कार्यवाही में संसदीय समिति की रिपोर्ट पर निर्भरता संसदीय विशेषाधिकारों का उल्लंघन नहीं करती। लेकिन पीठ ने यह स्पष्ट कर दिया है कि इन रिपोर्ट को अदालतों में चुनौती नहीं दी जा सकती है।

अप्रैल 2017 में दो जजों की बेंच ने संविधान पीठ को भेजा था कि क्या कोर्ट में संविधान के अनुच्छेद 32 या अनुच्छेद 136 के तहत दाखिल याचिका पर कोर्ट संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट को रेफरेंस के तौर ले सकती है और इस पर भरोसा कर सकती है ?

क्या ऐसी रिपोर्ट को रेफरेंस के उद्देश्य से देखा जा सकता है और अगर हां तो किस हद तक इस पर प्रतिबंध रहेगा? ये देखते हुए कि संविधान के अनुच्छेद 105, 121, और 122 में विभिन्न संवैधानिक संस्थानों के बीच बैलेंस बनाने और 34 के तहत संसदीय विशेषाधिकारों का प्रावधान दिया गया है।

जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस रोहिंग्टन फली नरीमन ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया औप इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च द्वारा ह्युमन पापिलोमा वायरस ( HPV) के लिए टीके  की इजाजत देने संबंधी याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। ये टीका ग्लैक्सो स्मिथ क्लिन एशिया लिमिटेड और एमएसडी फार्मास्यूटिकल्स प्राइवेट लिमिटेड बना रहे थे जो महिलाओं को सर्वाइकल कैंसर से बचाव के लिए था और टीके के लिए प्रयोग पाथ इंटरनेशनल की मदद से गुजरात व आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा किया जा रहा था। ये मामला इस दौरान कुछ लोगों की मौत होने और मुआवजा देने के मुद्दे पर उठा।

सुनवाई के दौरान कोर्ट को 22 दिसंबर 2014 को दी गई संसदीय स्थाई समिति की 81 वीं रिपोर्ट के बारे में बताया गया। बार की ओर से मुद्दा उठाया गया कि क्या अनुच्छेद 32 के तहत  याचिका पर न्यायिक सुनवाई करते वक्त संसदीय समिति की रिपोर्ट के आधार पर गौर कर सकती है और इसके आधार पर आदेश जारी कर सकती है।

  भारत के अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने सबमिशन का एक लिखित नोट दायर किया जिसमें कहा गया कि संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट आसपास की परिस्थितियों या ऐतिहासिक तथ्यों को समझने के उद्देश्य से निर्धारित करने के लिए निर्माण के सर्वोत्तम बाहरी सहायक उपकरण हैं। उपचार करने की मांग ठीक है लेकिन किसी अन्य उद्देश्य के लिए नहीं है। याचिकाकर्ताओं के लिए उपस्थित वरिष्ठ वकील आनंद ग्रोवर और कॉलिन गोंजाल्विस प्रस्तुत किया कि संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल एक याचिका में अदालत द्वारा संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट को देखते हुए केवल निष्कर्ष निकालने के लिए तथ्यों के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए। जरूरी दिशाओं के मुद्दे के उद्देश्य के लिए ये ठीक है और पूर्ण नियम नहीं हो सकता कि इसे देखा नहीं जा सकता। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि जब तक रिपोर्ट का संदर्भ समिति के सदस्यों की अभिव्यक्ति की आजादी का उल्लंघन नहीं करता या रिपोर्ट को लागू करने या उसकी आलोचना करने का कोई प्रयास नहीं है, तो उस पर भरोसा नहीं किया जाना चाहिए। कई अधिकारियों का जिक्र करने के बाद पीठ ने पाया कि संसदीय स्थायी समिति नियमों के तहत गठित एक समिति है और उस सदस्य का क्या कहना है उस समिति के डोमेन के भीतर  है। समिति के एक सदस्य के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता केवल संविधान की प्रक्रिया को विनियमित करने  और नियमों व स्थायी आदेशों के प्रावधानों के अधीन है।

पीठ ने यह भी पाया कि न्यायिक समीक्षा की शक्ति का प्रयोग करते समय या संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट पर निर्भरता रखने के दौरान, संविधान के तहत आवश्यकतानुसार इस न्यायालय द्वारा संयम के सिद्धांत को लागू किया जाना चाहिए। “संसद के एक सदस्य या संसदीय स्थायी समिति के सदस्य जो संवैधानिक मानकों के भीतर भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का आनंद लेते हैं और संसद या समिति के भीतर संसद द्वारा बनाए गए नियमों या विनियमों का अदालत द्वारा संज्ञान  नहीं लिया जाता है।” बेंच के मुताबिक  संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट देने का निमंत्रण संवैधानिक संस्थानों के बीच संविधान प्रदान करता है कि नाजुक संतुलन को परेशान करने की संभावना है। अगर अदालत रिपोर्ट पर प्रतियोगिता और निर्णय लेने की अनुमति देती है तो यह संसद की सुरक्षा के संसद की भावना की ओर मुकाबला कर सकती है। बेंच इस विचार के पहले पक्ष में थी कि संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट को वास्तविक दस्तावेज पर रुख बढ़ाने के लिए एक दस्तावेज़ के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता कि एक विशेष गतिविधि अस्वीकार्य या गलत है।

 

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