खुली अदालत में केंद्र और सुप्रीम कोर्ट आमने सामने : न्यायिक नियुक्तियों के लिए कम सिफारिशें भेजने पर केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को दोषी ठहराया, SC ने भी सवाल दागे

खुली अदालत में केंद्र और सुप्रीम कोर्ट आमने सामने : न्यायिक नियुक्तियों के लिए कम सिफारिशें भेजने पर केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को दोषी ठहराया, SC ने भी सवाल दागे

न्यायाधीशों की नियुक्ति में देरी के चलते केंद्र और सुप्रीम कोर्ट के बीच खाई और बढती जा रही है और शुक्रवार को ये तनातनी खुली अदालत तक पहुंच गई।

हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक एक बेंच जिसमें न्यायमूर्ति एमबी लोकुर,जो सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम का हिस्सा है, और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता मणिपुर निवासी द्वारा दायर याचिका सुन रहे थे, जिन्होंने मणिपुर में एक जज की पीठ के सामने मामले को गुवाहाटी ट्रांसफर करने की याचिका दायर की थी क्योंकि मणिपुर में इस वक्त दो ही जज हैं जिनमें से एक ने उनके खिलाफ फैसला सुनाया था।

 सहायता मांगने के आदेश के अनुसार अटॉर्नी जनरल (एजी) केके वेणुगोपाल शुक्रवार को अदालत के समक्ष पेश हुए। केंद्र के शीर्ष कानून अधिकारी और सुप्रीम कोर्ट बेंच के बीच एक गरमागर्म बहस हुई।

वेणुगोपाल ने शिकायत की कि कॉलेजियम उच्च न्यायालयों के लिए पर्याप्त नामों की सिफारिश नहीं कर रहा है जो वर्तमान में 60% स्वीकृत शक्ति पर काम कर रहे हैं।

इसके लिए बेंच ने टिप्पणी की कि इसने केंद्र को उन नामों पर बैठने की स्वतंत्रता नहीं दी है जिनकी लंबे समय से अनुशंसा की गई थी।

न्यायमूर्ति लोकुर ने फिर सरकार के पास लंबित कॉलेजियम सिफारिशों की संख्या के बारे में पूछताछ की। जब एजी ने कहा कि उनके पास डेटा नहीं है, तो बेंच ने वापस जवाब दागा, "यह आपके साथ समस्या है (सरकार)। जब न्यायपालिका पर हमला करने की बात आती है, तो आपके पास डेटा होता है। लेकिन जब यह सरकार पर आता है तब आप कहते हैं कि आपके पास आंकड़े नहीं हैं। "

इस बात ने वेणुगोपाल को जबरदस्त टिप्पणी करने के लिए प्रेरित किया: "मुझे लगता है कि एनजेएसी एक बेहतर विकल्प था।" अदालत ने इसका जवाब नहीं दिया। हालांकि बेंच ने उत्तर-पूर्व में उन लोगों की दुर्दशा को उजागर किया और कहा, "उत्तर-पूर्व के लोग पीड़ित हैं। उन्हें क्या करना चाहिए? क्या वे अपने मामलों को दूसरे हाईकोर्ट में स्थानांतरित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट से संपर्क कर सकते हैं और वहां वकीलों की सेवा लेने के लिए पैसे खर्च करते हैं? "

एजी ने फिर अदालत को आश्वासन दिया कि कॉलेजियम की 19 अप्रैल की  मणिपुर उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति के लिए सिफारिश 10 दिनों में अनुमोदित की जाएगी। उन्होंने फिर भी पर्याप्त सिफारिशें ना करने के लिए कॉलेजियम को दोषी ठहराया और कहा, "हम मेघालय में एक और न्यायाधीश नियुक्त कर सकते हैं। लेकिन इससे समस्या का समाधान नहीं होगा। कॉलेजियम को भविष्य को देखना होगा। सिफारिशों को ध्यान में रखना होगा जो रिक्तियां जो छह महीने बाद उठेंगी .... ... कॉलेजियम हमें नाम नहीं भेजता है और सरकार को बताया जाता है कि यह प्रसंस्करण में मंद है। "

हालांकि बेंच ने जोर देकर कहा कि वह इस समय उत्तर-पूर्व से चिंतित है और केंद्र को 10 दिनों में हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के अक्टूबर, 2016 में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) को असंवैधानिक घोषित करने के बाद से सरकार और न्यायपालिका के बीच तनातनी रही है।हालांकि सरकार को उच्च  न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिएप्रक्रिया के नए ज्ञापन  [ एमओपी]  का मसौदा तैयार करने के निर्देश दिए गए थे लेकिन केंद्र और कॉलेजियम के बीच ये मुद्दा लटका हुआ है। तब से नियुक्तियों को भी खतरे में डाल दिया गया है, केंद्र न केवल बार-बार सिफारिशों पर बैठा रहता है बल्कि स्थायी  बनाने के बजाए अतिरिक्त न्यायाधीश की अवधि बढ़ाकर ऐसी एक सिफारिश भी बदल रही है।

हाल ही में केंद्र ने न्यायमूर्ति केएम जोसेफ की सिफारिश को खारिज कर दिया और कहा कि यह "अन्य उच्च, उपयुक्त और योग्य मुख्य न्यायाधीशों और विभिन्न उच्च न्यायालयों के वरिष्ठ  न्यायाधीशों के लिए निष्पक्ष और उचित नहीं होगा।"

इस तथ्य के बावजूद ये किया गया जबकि जनवरी में उनकी सिफारिश करते हुए मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति जे चेलामेश्वर, न्यायमूर्ति रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति एमबी लोकुर और न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ द्वारा  हस्ताक्षरित प्रस्ताव में कहा था कि उन्हें न्यायमूर्ति केएम जोसेफ भारत के सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किए जाने के लिए अन्य मुख्य न्यायाधीशों और उच्च न्यायालयों के वरिष्ठ  न्यायाधीशों के मुकाबले "अधिक योग्य और उपयुक्त है।"

 वास्तव में प्रस्ताव में विशेष रूप से उल्लेख किया था कि मुख्य न्यायाधीश और  वरिष्ठ न्यायाधीशों की योग्यता और अखंडता के अलावा  वरिष्ठता पर विचार करने के बाद निर्णय लिया गया था।तब से कई न्यायविद, पूर्व न्यायाधीश और वकील आगे आकर इस कदम के लिए केंद्र पर सवाल उठा रहे हैं, और कॉलेजियम द्वारा सिफारिश की पुनरावृत्ति की मांग कर रहे हैं।