बहुविवाह और निकाह हलाला पर एक और याचिका: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को नोटिस जारी किया

मुस्लिम समुदाय में बहुविवाह और निकाह हलाला के खिलाफ एक अन्य याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

सामाजिक कार्यकर्ता नाइश हसन की याचिका को भी सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड की पीठ ने अन्य चार याचिकाओं के साथ जोड़ दिया है। इन याचिकाओं पर संविधान पीठ में सुनवाई होगी।

लखनऊ निवासी नाइश हसन ने याचिका दाखिल कर बहुविवाह और हलाला को असंवैधानिक करार दिए जाने की मांग की है।

याचिका में कहा गया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) आवेदन अधिनियम, 1937 की धारा 2 को संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 21 और 25 की उल्लंघन करने वाली घोषित की जानी चाहिए क्योंकि यह बहु विवाह और निकाह हलाला को मान्यता देता है।

26 मार्च कोसुप्रीम कोर्ट में तीन न्यायाधीशों की बेंच ने मुस्लिमों के बीच बहुविवाह और निकाह हलाला की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं को सुनने पर सहमति व्यक्त करते  हुए मामले को  संविधान पीठ में भेज दिया था।

 चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर औरन्यायमूर्ति डीवाईचंद्रचूड की पीठ बहुविवाह और निकाह हलाला की प्रथा को चुनौती देने वाली चार याचिकाओं को सुन रही थी। ये याचिका भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय, समीना बेगम, नफीसा बेगम और मोहम्मद बिन हुसैन बिन अब्द अल काथिरी द्वारा दाखिल की गई हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता वी  शेखर और वकील गोपाल शंकरनारायण क्रमशः याचिकाकर्ता पीड़ितों समीना बेगम और नफीसा खान के लिए पेश हुए।

वरिष्ठ अधिवक्ता मोहन पारासरन और साजन पोव्वैया याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय और मोहसीन काथिरी का प्रतिनिधित्व किया जो वकालत भी कर रहे थे। उन्होंने कहा कि बहुविवाह  और ‘निकाह हलाला’ भी दो न्यायाधीशों की पीठ (अक्टूबर 2015) के आदेश का हिस्सा थे, जिसने मुसलमानों के बीच तीन तलाक के अभ्यास सहित तीनों मुद्दों को संवैधानिक न्यायालय में भेजा था। उस पीठ में कहा गया था कि अगर तीन तलाक, बहुविवाह और निकाह हलाला के परिणामस्वरूप मुस्लिम समुदाय में लिंग भेदभाव माना जाए या  इन्हें संविधान के तहत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं माना जाना चाहिए।

चारों याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर बहुविवाह और हलाला को असंवैधानिक करार दिए जाने की मांग की है।याचिका में कहा गया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) आवेदन अधिनियम, 1937 की धारा 2 को संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 21 और 25 का उल्लंघन करने वाला घोषित किया जाए, क्योंकि यह बहुविवाह और निकाह हलाला को मान्यता देता है। भारतीय दंड संहिता, 1860 के प्रावधान सभी भारतीय नागरिकों पर बराबरी से लागू हों।याचिका में यह भी कहा गया है कि ‘ट्रिपल तलाक आईपीसी की धारा 498A के तहत एक क्रूरता है। निकाह-हलाला आईपीसी की धारा 375 के तहत बलात्कार है और बहुविवाह आईपीसी की धारा 494 के तहत एक अपराध है।हैदराबाद के रहने वाले मौलिम मोहिसिन बिन हुसैन काथिरी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर मुसलमानों में प्रचलित मुता और मिस्यार निकाह को अवैध और रद घोषित करने की मांग की है।इसके अलावा याचिका में निकाह हलाला और बहुविवाह को भी चुनौती दी गई है।

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