राज्य ध्वज की मांग अनुचित, अनैतिक और अखंडता पर आंच

कर्नाटक के मुख्य मंत्री ने केंद्र सरकार के पास अपने राज्य के लिए अलग ध्वज को मान्यता देने की मांग भेजी है। यह ध्वज पीले, लाल और श्वेत पट्टियों का है जिसमें राज्य के प्रतीक चिह्न को इसके मध्य में उकेरा गया है। कन्नड़ अस्मिता के प्रतीक “गंडा भेरुन्दी” ( दो सिरों वाली मिथकीय मछली ) का यह चिह्न हिंदी को तथाकथित रूप से जबरन लादे जाने के विरोध में वर्षों से आन्दोलन के रूप में प्रदर्शित किया जाता रहा है। राज्य के कतिपय राजनीतिक दलों ने श्वेत पट्टी को हटाने तथा पीली-लाल पट्टियों को ही राज्य ध्वज के रूप में स्वीकार किया है। केंद्र सरकार ने ऐसी मांग पर नकारात्मक रुख दिखलाया है, लेकिन वहां आसन्न  विधानसभा चुनाव के माहौल में यह क्या गुल खिलायेगा, यह भविष्य ही बताएगा। कावेरी नदी के जल बंटवारे पर तमिलनाडु के साथ विवाद में होने वाले आन्दोलन में यही ध्वज लहराया जाता है।

वर्तमान में जम्मू-कश्मीर को छोड़कर किसी भी राज्य का अलग ध्वज नहीं है। ज्ञातव्य है कि संविधान के अनुच्छेद 370 के कारण वहां का संविधान ही अलग है तथा देश के अधिकांश क़ानून वहां के विधानमंडल द्वारा पारित होने के बाद ही लागू हैं। वहां के संविधान पर अंतिम निर्णय राष्ट्रपति की सहमति से ही होता है।

सन 1969 में करुणानिधि के नेतृत्व वाली द्रमुक ने भी अलग झंडे का प्रारूप प्रस्तुत किया था जिसमें ऊपर बांये किनारे पर भारत का राष्ट्रीय ध्वज अंकित था। उस समय राष्ट्रपति, राज्यपालों के तथा कई अलग-अलग ध्वज प्रचलित थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने न केवल अलग ध्वज की मांग को कठोरता से ठुकरा दिया था बल्कि सेना के रेजीमेंटों को छोड़कर विभिन्न झंडों का अस्तित्व समाप्त कर केवल तिरंगे को ही मान्यता दी थी। उसके बाद से अब विभिन्न सरकारी इमारतों, राष्ट्रपति भवन तथा राजभवनों आदि पर केवल तिरंगा ही फहराया जाता है। खालिस्तान, गोरखालैंड, बोडोलैंड जैसे अलगाववादी आन्दोलनकारियों ने अपने-अपने ध्वज घोषित कर रखे हैं तथा गाहे-बगाहे समाचार-पत्रों तथा मीडिया में नज़र आते हैं। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि राज्यों ने अपने-अपने प्रतीक चिह्न बना रखें हैं लेकिन सरकारी पत्रों आदि में “भारत सरकार की सेवा में” ही अंकित किया जाता है। पोस्टेज स्टैम्प केंद्र तथा राज्यों के लिए समान हैं। कुछ वर्ष पूर्व तक रसीदी टिकटों पर संबंधित राज्य का नाम छपा होता था लेकिन अब ऐसा नहीं है।

भारत के संविधान का पहला अनुच्छेद भारत को राज्यों का संघ होना उद्घोषित करता है। नये राज्यों के निर्माण तथा वर्तमान राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नाम में परिवर्तन के लिए राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश पर कानून बनाकर उसे लागू करने के लिए संसद को अधिकृत किया जाता है। संविधान की पहली अनुसूची में राज्य तथा केंद्र शासित राज्य क्षेत्र का जिक्र है तथा संसद साधारण बहुमत से इनमें से किसी भी तरह का कोई परिवर्तन करने के लिए स्वतंत्र है। भारतीय संविधान में यूं तो एक परिसंघ के बहुत सारे लक्षण विद्यमान हैं तथा एसआर बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) के वाद में सुप्रीम कोर्ट ने परिसंघवाद को एक आधारिक लक्षण भी घोषित किया है लेकिन यह आदर्श परिसंघ माने जाने वाले अमरीकी संविधान से इस मामले में फर्क है कि वहां उस समय 13 विभिन्न देशों ने अपनी सुरक्षा अक्षुण रखने तथा कुछ अन्य अत्यंत सीमित विषयों पर कानून बनाने के लिए संविधान का निर्माण किया था। वहां राज्यों के अलग संविधान, झंडे राज्यगान, नागरिकता तथा कानून हैं। वहां केंद्र तथा राज्यों की कार्यपालिका तथा विधायिका ही नहीं न्यायपालिका भी अलग-अलग हैं। यह दूसरी बात है कि समय के साथ वहां केन्द्रीकरण की प्रवृत्ति आकार ले चुकी है तथा वहां के लोग अपने को संयुक्त राज्य का नागरिक बतलाने में अधिक गर्व महसूस करते हैं।

भारतीय संविधान केंद्र, राज्यों तथा केंद्र शासित क्षेत्रों के लिए प्रावधान करता है लेकिन यहाँ एकल नागरिकता है, राज्यपालों की नियुक्ति होती है तथा सिंगिल न्यायपालिका है जो संविधान तथा अन्य कानूनों का अर्थान्वयन करती है। भारत में एक राष्ट्र ध्वज है। राष्ट्र ध्वज को फहराने/उतारने आदि को नियमित करने के लिए भारतीय ध्वज संहिता (2002) है तथा इसके दुरुपयोग को रोकने/दंडित करने के लिए प्रतीक और नाम (अनुचित प्रयोग निवारण) अधिनियम,1950 तथा राष्ट्रीय सम्मान (अपमान की रोकथाम) अधिनियम, 1971 लागू है। संविधान में उल्लिखित मौलिक दायित्वों के अनुच्छेद 51 (क) में संविधान का पालन करने और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज और राष्ट्र गान का आदर करने का नागरिकों का पुनीत दायित्व बतलाया गया है।

राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा भारत के राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है। भारत संघ बनाम नवीन जिंदल (2004) के वाद में सुप्रीम कोर्ट ने घोषणा की थी कि तिरंगे को फहराने का हर भारतीय को मौलिक अधिकार है। हालाँकि कई बार अति उत्साह में झंडे के प्रयोग को लेकर दुश्वारियां भी आई हैं। 1994 में मिस यूनिवर्स बनी सुष्मिता सेन की बग्घी के पिछले हिस्से में तिरंगे को बांधने पर विवाद हुआ था, 2001 में मंदिरा बेदी द्वारा तिरंगे बार्डर वाली साड़ी का प्रयोग करने तथा उसी वर्ष सचिन तेंदुलकर द्वारा तिरंगे वाला केक काटने पर विवाद हुआ था। कई फिल्मों में राष्ट्रध्वज तथा राष्ट्रगान के प्रतिषिद्ध उपयोग पर भी लोगों की भृकुटियाँ तनी हैं। अंतर्राष्ट्रीय मैचों तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों आदि में हम अपनी ख़ुशी जाहिर करने के लिए तिरंगे को लहराकर आनंदित होते हैं।

संविधान में राज्यों को अपना अलग ध्वज रखने/बनाने की अनुमति देने का कोई प्रावधान नहीं है। राज्यों का सृजन प्रशासकीय कारणों से हुआ है तथा अनुच्छेद 355 के अनुसार संघ का यह कर्तव्य है कि वाह्य आक्रमण और आतंरिक अशांति से प्रत्येक राज्य की सुरक्षा करे और प्रत्येक राज्य की सरकार का इस संविधान के उपबंधों के अनुसार इसको चलाना सुनिश्चित करे। अनुच्छेद 256 से 263 तक के अनुच्छेदों में सामान्य स्थितियों में संघ को राज्य पर नियंत्रण के विभिन्न अधिकार उल्लिखित हैं जिसमे संसद द्वारा बनायी गयी विधियों का अनुपालन सुनिश्चित कराना, राज्य की कार्यपालिका शक्ति को संघ की उस विषय की शक्ति में अड़चन न बनने देना, राष्ट्रीय और जलमार्ग सहित राष्ट्रीय महत्व के संचार साधनों की देख रेख तथा रेलों का संरक्षण करना इत्यादि शामिल है। अनुच्छेद 285 से 289 में अंतरशासन-कर मुक्ति के प्रावधान करता है जिसके अंतर्गत संघ या राज्य आपस में एक-दूसरे के विरुद्ध करारोपण नहीं करेंगे। इन प्रावधानों से स्पष्ट है कि संविधान राज्यों को अलग इकाई के तौर पर नहीं देखता है – उनमें सहकारिता का भाव है, स्पर्धा का नहीं। राज्य केंद्र के अभिकर्ता या उपकरण नहीं हैं तथा शक्तिशाली केंद्र की तरह शक्तिशाली राज्य भी आज की आवश्यकता है। ऐसी मांगों से छुद्र राजनीतिक स्वार्थ भले ही सिद्ध हो जाएँ, देश में अलगाववाद का बीजारोपण होगा जो देश की अखंडता के लिए खतरा बन सकता है। परिसंघ हमारी राजव्यवस्था में विद्यमान है और हमें उसकी जीवंत उर्जा का अनुभव होता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अनुच्छेद 1(1) में भारत को राज्यों का संघ कहा गया है। इसे सोच समझ कर संघ कहा गया है, परिसंघ नहीं। प्रारूपण समिति यह स्पष्ट कर देना चाहती थी कि यद्यपि भारत एक परिसंघ है, यह परिसंघ राज्यों के साथ करार का परिणाम नहीं है। राज्यों को अलग होने का अधिकार नहीं है। वे संघ से अलग नहीं हो सकते। परिसंघ नष्ट नहीं किया जा सकता है। इसीलिये वह संघ है। प्रशासन की सुविधा के लिए देश को विभिन्न राज्यों में बांटा जा सकता है किन्तु देश एक अखंड और अविभाज्य इकाई है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री की अलग झंडे की मांग आज भले ही निश्छल लगे लेकिन यह भानुमती का ऐसा पिटारा साबित हो सकता है जिसके खुलते ही राष्ट्रघाती शक्तियां सर उठाने लगेंगी। यह अनुचित, अनैतिक और संविधान के शब्दों और भावों के विरुद्ध है। इससे देश की अखंडता पर आंच आ सकती है।

केंद्र सरकार को समय रहते इसे सख्ती से दबाना चाहिए तथा संविधान के उपलब्ध प्रावधानों में प्रशासकीय आदेश निर्गत करने चाहिए जिससे भविष्य में ऐसी कोई मांगे न उठे।

 (पूर्व विभागाध्यक्ष एवं अधिष्ठाताविधि विभागलखनऊ विश्वविद्यालय तथा बनस्थली विद्यापीठ )

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