देरी के लिए लिखे गए माफीनामे की भाषा पर नाराज सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार की खिंचाई की [आर्डर पढ़े]

न्यायमूर्ति जे चेल्मेश्वर और न्यायमूर्ति किशन कौल की पीठ ने देरी होने के आधार पर बरी किए जाने के खिलाफ राज्य सरकार की विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी।

कोर्ट ने सरकार द्वारा जारी हलफनामे पर गौर किया और कहा कि कम से कम इसकी भाषा तो ऐसी होनी ही चाहिए ताकि यह समझ में आ सके. इस याचिका में कहा गया था, “विशेष अनुमति याचिका दाखिल करने में देरी इस वजह से हुई कि …the State Government was sent of relation of Legislative Assembly in State of Maharashtra when the present Government came in existence the total staff of Government Advocate penal was changed. Due to disturbances, some files could not have been traced and a proper step of filing has not been taken…”

पीठ ने कहा, “ऊपर (अंग्रेजी में) जो लिखा गया है उसका कोई अर्थ नहीं निकलता है। याचिकाकर्ता के वकील के कहने का मतलब यह है कि राज्य में तीन साल पहले नई सरकार बनी और सरकारी वकीलों का नया पैनल बना है।”

पीठ ने कहा कि वह इस तरह की परिपाटी और जिस तरह से याचिका दायर की गई है वह उसे पसंद नहीं है। बेंच ने महाराष्ट्र के मुख्य सचिव को इस मामले की निजी तौर पर पड़ताल करने को कहा कि क्यों नहीं इस मामले की गंभीरता को देखते हुए याचिका शीघ्र दायर नहीं की गई और राज्य क्यों इतनी असावधानीपूर्वक आवेदन दाखिल करता है।

 

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